लौहनगरी जमशेदपुर से 35 किलोमीटर दूर स्थित हाथीखेदा मंदिर अपनी अनोखी मान्यताओं और भव्यता के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर में किसी देवी-देवता की नहीं, बल्कि हाथी की पूजा की जाती है। रोजाना यहां हजारों भक्त दर्शन के लिए आते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। इस मंदिर की कहानी और परंपराएं इसे झारखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक बनाती हैं।
प्राकृतिक सुंदरता से घिरा है मंदिर
पटमदा के बोड़ाम प्रखंड में स्थित यह मंदिर चारों तरफ से पहाड़ों और घने जंगलों से घिरा हुआ है, जो इसकी सुंदरता को और भी बढ़ा देते हैं। भक्त यहां पूजा करने के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य का भी आनंद उठाते हैं। बाबा हाथीखेदा ठाकुर का यह मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। यहां हाथी की पूजा की परंपरा इसे बाकी धार्मिक स्थलों से अलग बनाती है।
मन्नत के लिए चुनरी और नारियल बांधने की परंपरा
इस मंदिर के प्रति मान्यता है कि यहां मांगी गई मन्नतें अवश्य पूरी होती हैं। मन्नत मांगने के लिए भक्त पेड़ पर चुनरी और नारियल बांधते हैं। इसके अलावा, यहां भेड़ की बलि चढ़ाने की परंपरा भी काफी पुरानी है। खास बात यह है कि यहां का प्रसाद केवल पुरुष ग्रहण करते हैं, महिलाओं को इसे खाने की अनुमति नहीं है।
प्रसाद को घर ले जाने की मनाही
मंदिर के नियमों के अनुसार, यहां का प्रसाद घर ले जाना प्रतिबंधित है। मंदिर के अंदर हाथियों की अनेक मूर्तियां हैं और पूरा परिसर घंटी, चुनरी और नारियल से सजा हुआ है। मन्नत पूरी होने पर भक्त यहां भेड़ की बलि देते हैं, जिसका कुछ हिस्सा मंदिर में चढ़ाया जाता है और बाकी प्रसाद के रूप में वहीं बनाकर खा लिया जाता है। झारखंड समेत देशभर से भक्त इस मंदिर के दर्शन करने आते हैं।
